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आरक्षण की पात्रता पर फंसा बड़ा अफसर! प्रमुख अभियंता के.के. कटारे के जाति प्रमाण-पत्र पर जांच के बाद प्रशासनिक व्यवस्था में मचा हड़कंप,

आरक्षण की पात्रता पर फंसा बड़ा अफसर!
प्रमुख अभियंता के.के. कटारे के जाति प्रमाण-पत्र पर जांच के बाद प्रशासनिक व्यवस्था में मचा हड़कंप,

रायपुर : – राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अनुसूचित जाति के आरक्षण लाभ की पात्रता को लेकर दायर शिकायत पर उच्च स्तरीय प्रमाणिकरण छानबीन समिति ने विस्तृत परीक्षण के बाद आदेश जारी किया है।

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यह कार्रवाई अधिवक्ता विजय मिश्रा के लगातार प्रयासों और दस्तावेजी अनुसरण का परिणाम मानी जा रही है। यह वही मुद्दा है जिसे हमने पहले भी प्रमुखता से उठाया था और दस्तावेजों के आधार पर खबर प्रकाशित की थी। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हुई और प्रकरण औपचारिक जांच तक पहुँचा। अब समिति के आदेश ने पूरे मामले को निर्णायक मोड़ दे दिया है।

कागजी दस्तावेज बताते हैं कि संबंधित अधिकारी के जाति प्रमाण-पत्र और राज्यवार आरक्षण लाभ की वैधता पर आपत्ति दर्ज कराते हुए 1950 की राष्ट्रपति अधिसूचना तथा 1978 पूर्व निवास के आधार की जांच की मांग की गई थी। शिकायत पर शासन स्तर से परीक्षण हुआ और अंततः मामला छानबीन समिति तक जा पहुँचा।

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आदेश के मूल आधार –
समिति के आदेश (दिनांक 26/02/2026) में निम्न प्रमुख बिंदु दर्ज हैं जिसमें 10 अगस्त 1950 की राष्ट्रपति अधिसूचना के अनुसार अनुसूचित जाति/जनजाति की सूची राज्य-विशिष्ट है अर्थात यदि मूल निवासी अन्य राज्य (यहाँ महाराष्ट्र) का पाया जाता है, तो छत्तीसगढ़ में आरक्षण लाभ स्वतः मान्य नहीं होगा। साथ ही 1978 से पूर्व छत्तीसगढ़/तत्कालीन मध्यप्रदेश में वैधानिक निवास का दस्तावेजी प्रमाण अनिवार्य होना चाहिए।

प्रस्तुत अभिलेखों से उक्त अवधि का निर्विवाद प्रमाण स्थापित नहीं हुआ और समिति ने अपने आदेश में यह भी निर्देशित किया है कि नियमानुसार आगे की कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

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के.के. कटारे की भूमिका और पदस्थापना पर सवाल –

इस प्रकरण में राज्य की प्रमुख ग्रामीण अधोसंरचना योजना प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) में कार्यरत के.के. कटारे, प्रमुख अभियंता का नाम चर्चा में है। यदि आरक्षण श्रेणी की वैधता पर प्रश्न खड़े होते हैं, तो स्वाभाविक रूप से निम्न मुद्दे उभरते हैं क्या प्रारंभिक नियुक्ति संबंधित श्रेणी के आधार पर हुई? क्या वरिष्ठता/पदोन्नति में आरक्षित श्रेणी का लाभ लिया गया? यदि प्रमाण-पत्र निरस्त होता है, तो क्या पूर्व सेवा लाभों का पुनर्मूल्यांकन होगा? क्या विभागीय सेवा पुस्तिका और पदोन्नति आदेशों की पुनर्समीक्षा की जाएगी?

प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा है कि यदि अंतिम स्तर पर प्रमाण-पत्र अमान्य घोषित होता है, तो नियुक्ति एवं पदोन्नति की प्रक्रिया की विधिक समीक्षा आवश्यक होगी।

उल्लेखनीय यह भी है कि श्री कटारे की नियुक्ति वर्ष 1994 में विशेष भर्ती अभियान के तहत की गई थी। यह विशेष भर्ती अभियान स्पष्ट रूप से आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए संचालित किया गया था, जिसमें केवल पात्र आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी ही परीक्षा में सम्मिलित हो सकते थे। ऐसे में परीक्षा में सम्मिलित होना, चयनित होना, नियुक्ति प्राप्त करना और उसके बाद पदस्थापना होना यदि पात्रता ही प्रश्नांकित है तो संपूर्ण प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

यदि मूल आधार ही विधिक रूप से स्थापित नहीं होता, तो उस पर आधारित नियुक्ति और पदोन्नति को वैधानिक संरक्षण दिया जा सकता है या नहीं, यह अब जांच और संभावित विधिक परीक्षण का विषय बन गया है।

शिकायतकर्ता की भूमिका –

इस मामले को लेकर अधिवक्ता विजय मिश्रा ने लगातार दस्तावेज एकत्र कर संबंधित मंचों पर प्रस्तुत किए। उन्होंने राज्यवार आरक्षण सिद्धांत, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और निवास के दस्तावेजी आधार को रेखांकित करते हुए परीक्षण की मांग की थी।

उनके प्रयासों के बाद ही प्रकरण ने औपचारिक जांच का रूप लिया। प्रशासनिक जानकार मानते हैं कि व्यवस्था में यदि तथ्य और दस्तावेज के साथ शिकायत की जाए, तो प्रक्रिया चलती है यह मामला उसका जीता-जागता उदाहरण है।

सुशासन की कसौटी पर कार्रवाई –

राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि वर्तमान शासनकाल में शिकायतों पर कार्रवाई की गति बढ़ी है। इसे सुशासन की नीति का परिणाम बताया जा रहा है, जहाँ दस्तावेजी शिकायतों पर संस्थागत जांच की प्रक्रिया सक्रिय हुई।
शासन सूत्रों का कहना है कि नियम सबके लिए समान हैं। यदि पात्रता पर प्रश्न है, तो उसका परीक्षण होना ही चाहिए।

आपराधिक मामला दर्ज होगा? –

अब बड़ा प्रश्न यह है कि समिति के आदेश के बाद अगला कदम क्या होगा। अधिवक्ता श्री मिश्रा ने बताया कि यदि जाति प्रमाण-पत्र निरस्त होता है, तो संबंधित नियुक्ति/पदोन्नति आदेशों की विभागीय समीक्षा होगी। सेवा लाभों की पुनर्गणना या निरस्तीकरण की कार्यवाही की जाएगी। यदि दस्तावेजों में तथ्य छुपाने या गलत घोषणा का तत्व पाया जाता है, तो शासकीय नियमों के तहत विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में इसका व्यापक प्रभाव हो सकता है। राज्य में आरक्षण लाभ की पात्रता के मामलों में यह आदेश नजीर बन सकता है। अन्य विभागों में भी पुराने प्रमाण-पत्रों की समीक्षा की मांग उठ सकती है।अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि संबंधित पक्ष आदेश को न्यायालय में चुनौती देता है या नहीं। साथ ही, विभागीय स्तर पर सेवा अभिलेखों की समीक्षा और संभावित विधिक कार्रवाई किस दिशा में जाती है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

उक्त संबंधित पक्ष से भी हमने बात करने का प्रयास किया, किंतु उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

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